Thursday, December 12, 2013

यह है पर्यटकों के लिए छत्तीसगढ़ के पांच प्रमुख आकर्षण केंद्र


छत्तीसगढ़ अपनी मनोरम छठा से पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा था। छत्तीसगढ़  में आदिवासी सभ्यता और संस्कृति आज भी कायम है जिनको करीब से जानने और देखने के लिए विदेशी भारत आते हैं। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, पुरातात्विक स्थलों, झरने, प्राचीन गुफाओं और वन्यजीव पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित है। मध्य प्रदेश के सोलह दक्षिण पूर्वी क्षेत्रों को विभाजित करके 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ। प्राचीन काल में इस क्षेत्र को दक्षिण कौशल  के नाम से जाना जाता था। छत्तीसगढ़ तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न  संस्कृतियों के विकास का केंद्र रहा है। आइए नजर डाालते हैं छत्तीसगढ़ के प्रमुख पांच आकर्षण केंद्रों पर जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।


चित्रकोट फॉल्स (चित्रकोट जलप्रपात)
खूबसूरत राज्य छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से 39 किमी दूर इंद्रावती नदी पर  चित्रकोट जलप्रपात बनता है। अपने घोड़े की नाल समान मुख के कारण इस जल प्रपात को भारत का निआग्रा भी कहा जाता है। दुनियाभर से इस चित्रकोट को देखने के लिए लाखों पर्यटक आते हैं। बरसात के मौसम में मिट्टी के कटाव के कारण भूरे रंग के छाया में आश्चर्यजनक सुंदर लगता है, जबकि गर्मियों में झरना क्रिस्टल रंग में स्पष्ट दिखाई देता है। चित्रकोट जलप्रपात का मनोरम दृश्य भव्य और शानदार है।


इंद्रावती नेशनल पार्क 
इंद्रावती नेशनल पार्क छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय और सबसे मुख्य वन्यजीव उद्यानों में से एक माना जाता है। 1983 में इस पार्क को टाइगर रिजर्व के रूप में घोषित किया है और जल्द ही भारत के सबसे मशहूर बाघ अभयारण्यों में से एक बन गया। अभयारण्य में तेंदुए, बंगाल टाइगर, स्लॉथ बीयर, जंगली कुत्ता, चार सींग वाले मृग, धारीदार हाइना और कई विलुप्त प्रजातियों के जानवर रहते हैं।

भोरमदेव मंदिर 
छत्तीसगढ़ के कवर्धा शहर में स्थित भोरमदेव मंदिर एक प्राचीन मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। भोरमदेव मंदिर को नाग राजवंश के राजा रामचंद्र लगभग 7 से 11 वीं शताब्दी तक की अवधि में बनाया गया था। भोरमदेव मंदिर में खजुराहो मंदिर की झलक दिखाई देती है, इसलिए इस मंदिर को छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है। भोरमदेव मंदिर पर नृत्य की आकर्षक भाव भंगिमाएं के साथ-साथ हाथी, घोड़े, भगवान गणेश एवं नटराज की मूर्तियां चंदेल शैली में उकेरी गई हैं। भोरमदेव महोत्सव में हजारों की संख्या में श्रद्धालु और पयर्टक इकट्ठा होते हैं। ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक महत्व को स्थानीय कलाकार की अपनी प्रतिभा के जरिए लोगों को साझा करते हैं।

कांकेर 
छत्तीसगढ़ के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित कांकेर जिले में कई रमणीय पर्यटक स्थल है। कांकेर पैलेस, झरना, जंगल, विभिन्न प्रकार के लकड़ी, गडिय़ा पर्वत और लकड़ी आदि के आकर्षणों के कारण कांकेर की ओर पर्यटक तेजी से उभर रहा है। सुंदर आदिवासी गांवों की संस्कृति और लकड़ी के नक्काशी वाले हस्तशिल्प व बांस की वस्तुओं की कलाकृतियां कांकेर की पहचान है। 12 वीं सदी में कांकेर पैलेस में शाही परिवार से रहते थे। महल के कुछ हिस्सों को एक होटल में तब्दील कर दिया गया है।

कोटमसर गुफा 
संभाग मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर कांगेरघाटी राष्ट्रीय उद्यान में कोटमसर गुफा स्थित है। विश्व की सबसे लंबी इस गुफा की लंबाई 4500 मीटर है। चूना पत्थर के घुलने से बनी ये गुफाएं चूनापत्थर के जमने से बनी संरचनाओं के कारण प्रसिद्ध है। पाषाणयुगीन सभ्यता के चिन्ह आज भी यहां मिलते हैं। कोटमसर की गुफा अपने प्रागैतिहासिक अवशेषों, अद्भुत प्राकृतिक संरचनाओं और  विस्मयकारी सुंदरता के लिए मशहूर है। कोटमसर गुफा पर्यटकों के लिए नवंबर में खोल दिया जाता है।

Wednesday, December 11, 2013

घाटियों और मठों की धरती लद्दाख के रंगीन त्योहार

 हिमालयी दर्रो के बीच स्थित लद्दाख की सुंदर झीलें, आसमान को छूते पहाड़ और आकर्षक मठ हर किसी को अपनी आकर्षित करता है। लद्दाख में त्योहारों के दौरान अनूठा तिब्बती संस्कृति, परंपरा और लद्दाखी लोगों की रहनसहन को बखूबी अनुभव किया जा सककता है। लद्दाख के विभिन्न क्षेत्रों में वर्ष भर में कई समारोह को मनाया जाता है। लद्दाख की प्राकृतिक सुंदरता और कई त्योहार पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है। पेश है लद्दाख के कुछ महत्वपूर्ण त्योहारों की सूची:-

हेमिस महोत्सव-
हेमिस लद्दाख में एक सबसे लोकप्रिय और सबसे बड़ा त्योहार है। हेमिस उत्सव का प्रमुख आकर्षक मुखौटा नृत्य है। जून माह में बौद्धविहार हेमिस का परिसर हेमिस महोत्सव से रंगीन हो उठता है। यह त्योहार गुरु पद्मसंभव को समर्पित है और उनके जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। स्थानीय लोगों और पर्यटकों दोनों एक साथ जश्न का आनंद लेते हैं। लंबे सींगों के साथ मुखौटों से सुशोभित नर्तक विशेष प्रकार की ढोल के साथ नृत्य करते हैं तो यह समा देखते ही बनता है। इस अवसर पर हस्तकला की कृतियों से भरा हुआ मेला दर्शकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र होता है।

दोसमोचे महोत्सव-
लेह में फरवरी के दूसरे सप्ताह में डोसमोचे महोत्सव मनाया जाता है। यह लद्दाख के नए समारोहों में से एक है। इस महोत्सव के दौरान हर साल विभिन्न मठों में मुखौटा नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। इस अलावा धार्मिक प्रतीकों को लकड़ी के खंभों पर पताका को सजाकर लेह के बाहर आयोजित किया जाता है। दोसमोचे त्योहार दो दिनों तक चलता है जिसमें बौद्ध भिक्षु नृत्य करते हैं, प्रार्थनाएं करते हैं और क्षेत्र से दुर्भाग्य और बुरी आत्माओं को दूर रखने के लिए अनुष्ठान करते हैं।

लोसर महोत्सव-
लोसर तिब्बती या लद्दाखी नव वर्ष के रूप में मनाया जाने वाला अन्य त्योहार है जो चंद्र कैलेंडर पर आधारित है। लद्दाख में लोसर का त्योहार दिसंबर और जनवरी के महीने में दो सप्ताह के लिए मनाया जाता है। लोसर त्योहार के दौरान आने वाले पर्यटकों पारंपरिक संगीत और नृत्य का आनंद देते हैं। त्योहार के दौरान होने वाली अनुभव से उनको मंत्रमुग्ध कर देती है। इस अवसर पर पुराने वर्ष की सभी बुराइयों और वैमनस्यों को समाप्त करने का प्रयत्न किया जाता है और नए साल में पूर्णतया नया जीवन आरंभ करने की कोशिश की जाती है। इस त्योहार की तिथि और स्थान हर साल बदलते रहते हैं।

माथो नागरंग-
मार्च के प्रथमार्ध में मनाए जाने वाले त्योहार माथो नागरंग के दौरान पवित्र अनुष्ठान और नृत्य प्रदर्शित किए जाते हैं। चार सौ साल पुराने थांगका या सिल्क से बनाई जाने वाली धार्मिक तिब्बती पेंटिंग और इसके साथ जुड़ा त्योहार माथो नागरंग पर्यटकों के बीच लोकप्रिय हैं। यह त्योहार माथो मठ में मनाया जाता है।

फियांग और थिक्से-
फियांग और थिक्से त्योहार लद्दाख में जुलाई या अगस्त में मनाया जाता है। इस त्योहार के दौरान विभिन्न मठों से भिक्षुओं भगवान और देवी के विभिन्न रूपों को दर्शाती है और अद्भुत मुखौटा नृत्य प्रदर्शन करने के लिए रंगीन जरी के वस्त्र और मुखौटे पहनते हैं। 

Tuesday, April 30, 2013

एक छोटी सी कहानी


एक साधारण सी लड़की हर बड़े-छोटे शहर में कही भी कुछ हालत से कुछ खुद से उलझी। रंग गेहुआ सा। उम्र वहीं कोई बीस बाइस साल। यौवन पर चढ़ाव, मन कोमल सा। भोली-भाली सी सुरत, आंखें सुखे झील सा। दिखे जैसे वसंत में खिले सरसों सा। पर उसके अंदर ऐसा हुक था जो जान सका न कोई। कहीं खौफ था वजूद खोने का। मानो जैसे खो ही गया था उसका वजूद। कुछ साल पहले दोस्तों के जिदंगी को देख बचपन में लगी चोट आंखों में सिमट गया था, भूलकर भी कभी प्यार न करने को तय किया था। भागमभाग वाली शहर में न जाने
कहां से जिदंगी को सुकुन मिला। कई दफा तो ऐसा लगा मायावी दुनिया का माया तो नहीं। इनसानी जद्दोजहद के गहरे एहसास पिघलकर उसके सीने में उतरता। फिर भी उसकी तलाश खत्म नहीं होती है। उसके सीने में भटकाव का तपिश थी, जो छोटे शहर से खिंचते हुए वहां तक लाया था। उसको जाना है जिदंगी में बहुत दूर तक। अभी तक वह अकेली चली पर अब क्यों लगता है उसको दोस्त की जरूरत है जिसके लिए अचानक रास्ता बदल शहर आ गई थी। वह था साथ-साथ हमेशा उसकेलड़की को महसूस होता था, लेकिन वह चुप थी उसके इंतजार में। कुछ दिन उसकी इंतजार खत्म हुई। एक-दूसरे को प्यार करने लगे, दिन में साथ-साथ रहते पर बातें कम करने लगे, दूर जाते तब उनकी बातें व उनकी आंखों में दिखता अपनापन याद आने लगा। हंसी और पल भर का गुस्सा!! इस लफ्ज के मायने हैं उसके लिए। उसके हंसी चेहरे पर गम कभी दिखती नहीं, अपनों पर उसका गुस्सा पल भर का रहता बहुतों में वह अलग दिखती जिसकी विश्वास उसकी जिदंगी बन गई। वह हर पल उसका होता गया और खुशबू की बयां करने की तलब बढ़ती गई। उनके बीच खास लगाव थी
क्योंकि दोनों की प्यार दूर  होते हुए भी जज्बाती थी और साथ था रिश्तों का विश्वास। औरों से अलग-अलग दुनिया है उनके पास। फिर भी तरसते है मिलने को। न जाने कौन सा प्यार है जिसको खुदा मानते है क्योंकि खुदा भी दूर रहते हुए एक-दूसरे के पास है। शायद इसलिए। अल्फाजों में बयान नहीं की जा सकती उनकी कहानी को। फिर भी .....................
सानो को देख नीर कभी सोचा न था सानो सिर्फ नीर की होना चाहती है। सानो जो अलग थी। उसकी आंखों में वह कशिश थी जो पाने को जी चाहता था। सानो सपना देखा करती थी मंजिल की ऊचाईयों को छूने का। मंजिल की सीढ़ी मिली उसे जाना पड़ा कही दूर सपनों को पूरा करने के लिए। नीर था दूर फिर भी उसके पास था। हर दिन बातें होती। दोनों के पास एक धरोहर था वह था उनकी दूरी। नीर को नौकरी मिली वह भी अपने सपने को पूरा करने के लिए मेहनत करने लगा। मंजिल मिलता गया कारवां बनता गया न मिटा तो उसका अनुभव। उसकी जिदंगी की सबसे बड़ी खुशी थी कि उसको कोई चाहता है। नीर और सानो अनुभव करते है जीवन एक प्रतिध्वनि है। तुम जो करते हो तुम पर बरस जाता है जितना तुम्हारा प्रेम बढ़ता है उतना उन्हें साफ होने लगता है कि दूरी से कोई पराया नहीं होता, जिससे प्रेम हो जाता है उनसे परायापन मिट जाता है। सानो मानती है कि एक का दुख दूसरा अनुभव करता है। जो निर्मल होता है। सानो किसी ग्रुप में नौकरी करती थी, वहां का माहौल और लोगों से वाकिफ नहीं थी। नौकरी के दौरान लागों की स्टाइल, रहन-सहन और चाटुकरा देख सोचती काश मैं भी ........पर खामोश होकर सबकी हरकतें देखी और सोचती ऐसी ही दुनिया है जहां लोग अपने को लाइमलाइट करने के लिए दूसरों का सहारा लेते हैं। सानो के पास आत्मविश्वास और जोश की कमी नहीं, लेकिन वह इतनी भोली थी कोई भी अपना उल्लू सीधा कर लें। नीर हर उस माहौल से वाकिफ था जिसकी परछाई आइने में साफ झलकती है। वह कहता औरत/लड़की समाज की आइना है। हर माहौल को अच्छा खराब औरत बना सकती है। औरत यानि महिला देश की ऐसी ताकत हैं, जो पूरे दुनिया को इधर से उधर कर दे पर उसको किसी सहारे की नहीं सहानुभूति की जरूरत है। सानो ने भी एक सपना देखा कि समाज के परदे की पीछे की बदली तस्वीर को दिखाएंगी, लेकिन शायद उनकी जिदंगी में भी वहीं होने वाला है, जो औरों के साथ होता है !!!

Thursday, April 18, 2013

मूर्तिकला का नायाब नमूना-एलिफेंटा


कहते हैं मुंबई सपनों का शहर है। जो खूबसूरत वादियों, समंदर और बॉलीवुड सितारों से सदा जगमगाता रहता है। पिछले साल मुंबई दर्शन करने का मौका मिला। गेटवे आफ इंडिया से बोट पर सवार होकर हमलोग एलिफेंटा की गुफा देखने के लिए आगे बढ़े। समंदर के बीच स्टीमर और कई बड़ी जहाजों को दूर छोड़ गतव्य को आगे बढ़ते हुए नजारों को देख मन में कई तस्वीर नजर आने लगी। समंदर के चारों ओर फैली हरयाली, प्रकृति के खूबसूरत नजारे, आसमान के आसमानी रंगे, अरब सागर की नीली लहरों से अठखेलियां करती पक्षियां। क्या प्राकृतिक नजारे थे। अरब सागर के नीली लहरों के छलकते पानी के  बीच बर्फीली हवाओं का झोंका मन मनमोह लिया। एलिफेंटा गुफाएं इतिहास प्रेमियों के साथ ही देशी विदेशी पर्यटकों को भी समान रूप से आकर्षित करती हैं।

एलिफेंटा की गुफाएं कलात्मक कलाकूतियों की श्रृंखला है जो कि एलिफेंटा आईलैंड में स्थित है। इो सिटी आफ केव्य कहा जाता है। मुंबई के गेटवे आफ इंडिया से लगभग 12 किमी की दूरी पर अरब सागर में स्थित यह छोटा सा टापू है। यहां सात गुफाएं बनी हुई है जिनमें से मुख्य गुफा में 26 स्तंभ हैं। भगवान शिव के कई रूपों को उकेरा गया है। यहां भगवान शंकर की नौ बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ हैं। शिल्प दक्षिण भारतीय मूर्तिकला से प्रेरित है। मूर्मिकला के ये नायाब नमूने को यूनेस्को विश्व धराहर की सूची में 1987 में शामिल किया गया।

इतिहास:-
एलिफेंटा गुफाओं का ऐतिहासिक महत्व है। चारों ओर से समुद्र से घिरा यह टापू कभी घरापुरी के नाम से जाना जाता था। इसके निमार्ण की सदी को लेकर विशषकों में मतभेद है और माना जाता है कि छठी से लेकर आठवीं शताब्दी के मध्य भारतीय शिल्पकला का नमूना एलिफेंटा की गुफाओं में देखा जा सकता है। गुफाओं को ठोस चट्टानों को तरासकर बनाया गया है। प्राचीन काल में पत्थरों को तराशकर खूबसूरत मूर्तियों को गढऩे की सम़द्ध भारतीय शिल्पकला का नूमना एलिफेंटा की गुफाओं में आसानी से देखा जा सकताहै हा।लांकि पुर्तगाली शासकों ने यहां की खूबसूरत मूर्तियों पर गोलियां बरसाकर उन्हें क्षतिग्रस्त  करने मे कोई कसर नहीं छोड़ी । पुर्तगालियों ने  अपने लैंडिंग स्पेस के पास हाथी की विशालकाय मूर्ति को देखकर इस स्थान का नाम एलिफेंटा  रखा लेकि ने 1814 में हाथी की मूर्ति क्षतिग्रस्त हो गई और बाद में इसे टुकड़ों में काट कर मुबई के ब्क्टिोरिया गार्डन्स जू लेकर दोबारा से ले लगाया गया। इसके अलावा और भी कई हाथियों की बेशकीमती मूर्तियों को पुर्तगालियों द्वारा तोड़ा गया फिर क्षति पहुंचाई गई।

दर्शनीय :-
लगभग 60000 वर्ग फीट क्षेत्रफल में फैला गुफा मंदिर में एक बड़ा कक्ष ए दो पाश्र्व कक्ष एंव गलियारा है। मंदिर में प्रवेश के लिए तीन प्रवेश मार्ग बने हुए है। पूर्व, पश्चिम और उत्तर की ओर प्रवेश किया जा सकता है। प्रवेश द्वार सीधे एक हाल में खुलता है जहां पर शिव पुराण संबंधित द़श्य उकेरे गए हैं। इस हॉल की खासियत यह है कि यहां बहुत ही हल्कार प्रकाश रहता है जो कभी ज्यादा जो कभी कम हो जाता है। बताया जाता है प्रकाश के तेज और कम होन की बजह से यहां स्थित मर्तियों के चेहरे के भाव भी बदलते रहते हैं। हॉल में  तकरीबन 30 स्तंभ है। यहां पश्चिम की ओर शिवलिंग बना हुआ है। यहां भगवान शंकर के विभिन्न रूपों तथा क्रियाओं को दशार्मी नौ बड़ी मर्तियां है जिसमें त्रिमूर्ति प्रतिमा सबसे आकर्षक है।  इस मूर्ति की ऊंचाई 17 फुट है। इसके अलावा पंचमुखी परमेश्वर, अर्धनारश्वर, गंगाधर, शिव का भैरव रूप आदि मूर्तियां भी आकर्षि त करती है। उत्तरी प्रवेश द्वार के पश्चिम की ओर नटराज और पूर्व की ओर योगीश्वर की मूर्ति है।  एलिफेंटा विश्व
धराहर होन के साथ धार्मिक स्थल, खूबसूरत पर्यटक स्थल और पिकनिक स्पॉट भी है।

Friday, April 05, 2013

ऊं शंशनैश्चराय नम:! शनि मंदिर शिंगणापुर


शनि देव की महिमा को कौन नहीं जनता। कब अपनी कृपा दृष्टि से राजा को रंक और रंक को राजा बना दे। शनि तीर्थ स्थल में ऊं शंशनैश्चराय नम:! शनि मंदिर शिंगणापुर का अलग ही महत्व है। इस गांव में मंदर नहीं है पर शनि देव की अपार कृपा है। घर है लेकिन दरवाजे नहीं हैं। न जाने कई खुशियां और महिमा से भरा परा है शिरडी के साई बाबा से 65 किलो  मीटर दूर शिंगणापुर गांव। शिंगणापुर धार्मिक स्थल के साथ लोकप्रिय पर्यटक स्थल भी है।
महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित गांव शिंगणापुर में हिंदु देवता शनि महराज देव को समर्पित प्रसिद्ध मंदिर है। इस गांव की एक रोचक कथा है। स्थानीय लोग अपने घरों में ताला नहीं लगाते हैं। शिंगणापुर शनि देव मंदिर की महिमा से कोई अंजान नहीं है। इसी वजह से शिंगणापुर धार्मिक स्थल के साथ लोकप्रिय पर्यटक स्थल है। ग्रामीणों का मानना है कि मंदिर जागृत देवस्थान है। माना जा है कि मंदिर में भगवान स्वयं सक्रिय यानि जीवित है और गांव के जनता और मंदिर की रक्षा करते हैं। मान्यता है कि इस गांव में कभी चोरी नहीं होती है, इसलिए मंदिर और घरों में गांव के लोग कभी ताला नहीं लगाते हैं। मंदिर के नजदीक या गांव में काई व्यक्ति चोरी करने का कोशिश करता है तो वह अंधा हो जाता है। इस युग कर यह पहला ऐसा गांव है जहां घरों में ताले नहीं लगते हैं। यह शनि महराज के कृपा से संभव है। 5.5 फुट की ऊंचे काले रंग की एक विशाल पत्थर शनि देवता के प्रतीक के रूप में खुले आकाश के नीचे एक चबूतरे पर अवस्थित है। धूप हो या आंधी, जाड़ा हो या बरसात शनिदेव बिना छत के  संगमरमर पर विरजमान रहते हैं। साथ में उनके पास भगवान शिव और हनुमान की प्रतिमा भी स्थापित है। अपराध मुक्त रिकॉर्ड के कारण इस क्षेत्र में देश का पहला बिना ताले का बैंक 2011 में खोला गया। बैंक के दरवाजे हर समय खुले रहते हैं।
मंदिर में रोजाना लगभग 50,000 आगंतुक दर्शन करने आते हैं, लेकिन इनकी संख्या अमावस्या के दिन तीन लाख से अधिक यानी छह गुना तक बढ़ जाती है। शनिदेव को खुश करने के लिए अमावस्या का दिन सबसे शुभ माना जा रहा है। शनिवार के दिन आने वाली अमावस्या को लोग शनि देव की पूजा, अभिषेक और झांकी आदि निकालते हैं। नवग्रहों में शनि को सर्वश्रेष्ठ ग्रह माना जाता है क्योंकि शनि एक राशि पर ज्यादा समय तक विराजमान रहता है। कहते है जब शनि की कृपा होती है तो रंक भी राजा हो जाता है और जब शनि कुपित हो जाए या उनकी अशुभ दृष्टि पर जाए तो सब कुछ नष्ट हो जाता है। शनिदेव की महिमा अपरमपार है।

Wednesday, February 27, 2013

कोई भी सृजनशील

















जीवन के यात्रा में अकसर कई राहें दिखती है
जीवन के आस-पास अनगिनत पलछिन दिखते है
कई राहों के बीच होता है एक राह होता है अपना
मानों तो एक पल में पूरा जीवन
इस पल में  पूरे जीवन का एहसास
जो बन जाती है जीवन की संवेदनशीलता
जीवन के एक पल में परिस्थितियां
जिदंगी के साथ रंग दिखाती है
जब बाहरी-भीतरी परिस्थितियां से लडऩा पड़ता है
न जाने कई बार दूसरों के खातिर
जिदंगी और मौत से जूझना पड़ता है
जिदंगी भर किसी एक के खातिर जीना
वह भी अपनी सीमाओं और मर्यादाओं में रहकर
जीवन के एक पल को सार्थक कर जाते हैं हर एक सृजनशील

Thursday, February 21, 2013

बेबसता की छलक....


हट साले ...रोज-रोज चला आता है भिख मांगने ।
तेरे मां-बाप नहीं है क्या? वह चिढ़ते हुए कहा। हर दिन हराम की कमाई खाने की आदत है साले को। ऐसे लोगों की न जात का पता होता है न घरवाले का! ऐ तो अपने जन्म का भेग रहे हैं। ऐसे कहने वाले वही साहब थे जो हर रोज स्टेशन पर दोस्तों की महफिल लगाए रहते थे। उनकी नजरें हर उस सुंदर लोगों पर रहता था जो देखने में .... ये तो आप समझ सकते हैं। इतने में वहां चार-पांच बच्चे उनकी पांव छूकर कहने लगे मार्ई-बाप पैसे दे दो, खाने को कुछ भी नहीं है। उनमें से किसी ने कहा, क्यूं तेरी मां भाग गई क्या? बेबसता की छलक उसकी आंखों में साफ दिखाई दे रहा था। मगर वे क्या करते समाज के मारे थे।  कुछ ही दूरी पर खड़ी बेजान सी महिला लड़खड़ाते चली आ रही थी, उसकी कपड़े बिखड़े, बाल फैले पड़े थे। उसकी आंखों की नीचे स्याह काले घेरे थे। देख कर जैसे लग रहा था कि उसका कोई अपना खो गया या उसके साथ कुछ हो या है। उसकी एक ही रट थी बाबू जी कुछ दे दो ! बाबू जी कुछ दे दो !  कुछ लोग उसकी लाचारी को देख मजाक कर रहे थे। कही गई होगी! फिफरे के साथ मजे रहे लोगों के बीच एक भला इनसान बुदबुदाया। अजीब कूढ़मगज लोग है मजे ले रहे हैं। लेकिन वह लाचार था। ज्यादा कुछ कहता तो लोग कहते ईमानदारी और सहिष्णुता का घुटी पिलाने आया है।

Wednesday, February 20, 2013

12 ज्योतिलिंग

  पूरेभारत वर्ष में कुल 12 ज्योतिर्लिंग है। शिव के द्वादश तिर्लिंगों का बड़ा महत्व है। कहा जाता है कि भगवान शिव के इन बारह अवतारों में से किसी एक ज्योतिर्लिंग का पूजन करता है उसे मुक्ति मिलती है। साथ हि दैविक, दैहिक एंव भौतिक कष्टों से छुटकारा मिलता है।

1. सोमनाथ= गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद किनारे स्थित है। चंद्रमा का एक नाम सोम भी है। चंद्रमा ने भगवान शिव को आराध्य मानकर पूजा की थी, इसलिए उसी के नाम पर इस ज्योतिर्लिंग का नाम सोमनाथ पड़ा। 12 ज्योतिर्लिंगों में इस स्थान को सबसे ऊपर स्थान दिया गया है। कहते हैं कि सोमनाथ में महामृत्युंजय का जाप करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। सोमनाथ मंदिर के परिसर में एक कुंड है, जिसके बारे में मान्यता है कि इस कुंढ में स्नान करने के बाद असाध्य से असाध्य रोग भी खत्म हो जाता है। शिव पुराण के अनुसार सोमनाथ के दर्शन नहीं कर पानेवाले भक्त सोमनाथ की उत्पति की कथा सुनकर भी वही लाभ उठा सकते हैं।

2. मल्लिकार्जुन= यह ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इसके दर्शन से सात्विक मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भारत के अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते है। महाभारत के अनुसार श्रीशैल पर्वत पर भगवान शिव का पूजन करने से अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है। कुछ ग्रन्थों में लिखा है कि श्रीशैल के शिखर के दर्शन मात्र करने से दर्शकों के सभी प्रकार के कष्ट दूर भाग जाते हैं, उसे अनन्त सुखों की प्राप्ति होती है।

3. महाकालेश्वर= मध्य प्रदेश के उच्जैन नगर में क्षिप्रा नदी के तट पर अवस्थित है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यंत पुण्यदायी महत्ता है। तांत्रिक परंपरा में प्रसिद्ध दक्षिण मुखी पूजा का महत्व बारह ज्योतिर्लिंगों में केवल महाकालेश्वर को ही प्राप्त है।

4. ओंकारेश्वर= मध्य प्रदेश में नर्मदा किनारे मान्धाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह यहां के मोरटक्का गांव से लगभग 12 मील (20 कि.मी.) दूर बसा है। यह द्वीप हिन्दू पवित्र चिन्ह ऊॅ के आकार में बना है।

5. केदारनाथ= उत्तराखंड में हिमालय  की बर्फीली चोटियों पर अलकनंदा व मंदाकिनी नदियों के तट पर केदारनाथ ज्योतिर्लिंग स्थित है। यहीं श्री नर और नारायण की तपस्थली है। उन्हीं की प्रार्थना पर शिव ने यहां अपना वास स्वीकार किया। पठार के बीच स्थित होने के कारण अलौकिक केदारनाथ लिंग साल भर बर्फ से घिरी रहती है। पुरातन काल में इस मंदिर की स्थापना पांडवों द्वारा मानी जाती है, लेकिन 8वीं सदी में आदिशंकराचार्य ने वर्तमान मंदिर परिसर की स्थापना की थी।

6. भीमाशंकर= ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सहाद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रद्वा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर होते है तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते है। इस ज्योतिर्लिंग के निकट ही भीमा नामक नदी बहती है। इसके अतिरिक्त यहां बहने वाली एक अन्य नदी कृष्णा नदी है।

7. विश्वनाथ=विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इस स्थान की मान्यता है कि यह स्थान सदैव बना रहेगा अगर कभी पृथ्वी पर किसी तरह की कोई प्रलय आती भी है तो इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को इसके स्थान पर रख देगें। कहा जाता है कि अपनी ससुराल हिमालय को छोड़कर भगवान शिव ने यहीं स्थायी निवास बनाया।

8. त्रयम्बकेश्वर= महाराष्ट्र के नासिक जिले में यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरु होती है। भगवान शिव का एक नाम त्रयम्बकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा। धार्मिक मान्यता के अनुसार काल सर्प योग के प्रकोप से मुक्ति पाने के लिए लोग दृर-दूर से यहां आते हैं।

9. वैद्यनाथ= वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां  स्थान बताया गया है। भगवान वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मंदिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथधाम कहा जाता है। यह स्थान झारखंड प्रांत, पूर्व में बिहार प्रांत के सन्थाल परगना के दुमका नामक जनपद में पड़ता है।

10. रामेश्वर= भगवान राम ने स्वयं अपने हाथों से रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी। राम ने जब रावण के वध हेतु लंका पर चढ़ाई की थी तो यहां पहुंचने पर विजय श्री की प्राप्ति हेतु उन्होंने समुद्र के किनारे बालुका (रेत) का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की थी। यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राच्य के रामनाथपुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है।

11. नागेश्वर। गुजरात में द्वारकापुरी से 17 मील दूर यह ज्योतिर्लिंग अवस्थित है। कहते हैं कि भगवान की इच्छानुसार ही इस ज्योतिर्लिंग का नामकरण किया गया है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है।

12. घृष्णेश्वर=महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद से 12 मील दूर बेरुल गांव में इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की गई थी। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। कुछ लोग इसे नाम घुश्मेश्वर नाम से पुकारते है। इन्हें 'घृष्णेश्वरÓ और 'घुसृणेश्वरÓ के नाम से भी जाना जाता है। शिवमहापुराण में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन है। ज्योतिर्लिंग घुश्मेश के समीप ही एक सरोवर भी है। जिसे शिवालय के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि जो भी इस सरोवर का दर्शन करता है उसकी सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है। यह ज्योतिर्लिंग अजन्ता एवं एलोरा की गुफाओं के देवगिरी के समीप तड़ाग में अवस्थित है।

नजर रखो....

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकता है
इसलिए जिदंगी की हर कदम पर नजर रखो
तो फिर देखो जिदंगी शोहरत के साथ होगा
न कि शोहरत तमाशा बनकर जिदंगी के साथ।।

अंजान शहर












जीवन के सफर में ऐसा लगता है
कभी कोई अपना, कोई पराया लगता है
न रंग न रोशनी दिखती है अपनों के बिन
ये धरती की खुशबू बयां करती है अपनेपन की
फिर भी कमी लगती है अपनों के बिन
लेकिन कभी-कभी कोई लगता है अपनापन सा
इस अंजान शहर, अंजान लोगों के बीच
तब लगता है जीवन के सफर में अक्सर  ऐसा होता है

Monday, February 04, 2013

एहसास












भींगती आंखों से मंजर नहीं देखे जाते
दरिया को छोड़ समंदर नहीं देखे जाते
अगर जिदंगी में कुछ  करना है तो
हालात से डरना कैसा, जंग लाजिमी हो
तो गुजरे वक्त नहीं देखे जाते
           हौसला अफजाई और बुलंद इरादे हो
           तो मंजिल को पाने में देर नहीं होती
           लेकिन वक्त की पहचान ने मुझे ऐसे धकेला की
           जिदंगी से शिकायत होने लगी तभी एहसास हुआ
ऊंचाई तक उडऩे के लिए विकास चाहिए
अंधेरे को हटाने के लिए प्रकाश चाहिए
सबकुछ कर सकते हैं सिर्फ हमें
पूर्ण आत्मविश्वास चाहिए ।।
         

जीने की राह

दौड़ लगाने से पहले गिर जाना सिख लो
रिश्ता जोडऩे से पहले हट जाना सिख लो
जिंदगी तो ईश्वर की उधार है यारों
जिदंगी जीने से पहले मर जाना सिख लो
पैसे के इस बाजार में हर चीज है बिकाऊ
मोल लगाने से पहले बिक जाना सिख लो
सुधारस पाने की तमन्ना करते है सभी
इसे पाने से पहले विषपान करना सिख लो
जुआ के सहारे ही लिखे जाते हैं महाभारत
कुछ करने से पहले सुन लेना सिख लो
मजबुरियों का हवाला किसे देते थे 'देव'
कुद कहने से पहले सोच लेना सिख लो

Friday, January 25, 2013

...और करता था वह मेहनत



करता था वह (किसान) मेहनत हर दिन बेटा समझ कर ।  
आशा थी कि आगे चलकर उसकी जिंदगी का सहारा बनेगा।
सींचा करता था बेटी की तरह। आशा थी कि अपनी साया से दूसरे का भरण-पोषण करेगी।  
लेकिन क्या पता था कि अपनी मेहनत पर सींची फसल पर किसी और का अधिकार होगा।
न चाहते हुए भी उसे करनी पड़ी आत्महत्या। क्योंकि उसकी जमीन किसी और की हो गई।
पत्नी को आत्महत्या इसलिए करनी  पड़ी क्योंकि न तो उसके पास पति था और न ही कर्जे के पैसे।
बेटी ने संभाली पुरखों की बीड़ा, उसे खानी पड़ी पत्थर और गोली की मार।
आखिर बेटी को करनी पड़ी आत्महत्या क्योंकि उसकी अस्मत (इज्जत) लुट चुकी थी।
अत: बेटे ने भी कर ली आत्महत्या क्योंकि उसके पास नहीं बचा था कुछ बचाने को।

क्या जानोगे इस शहर की बात .....













क्या जानोगे इस शहर की बात
कभी हुआ करती थीं यहां हरियाली
खेत-खलियानों चौराहों पर हुआ करती थी अटहाली
कभी खिला करती थी हर आंगन में किलकारियां
क्या जानोगे इस शहर की बात
मिट्टी के कण-कण के खतिर मिट गए सुपुत्र
घर-आंगन सुना पड़ा पर मन हरियाली था
दे गए कुर्बानी आमन चैन के वास्ते
क्या जानोगे इस शहर की बात
किसानों ने बीजा वह बीज जो
दे गया हरित क्रांति का युग
लख-लख दुआएं देते हैं वे लोग
जिनकी तकदीरें लिखी इस शहर में
क्या जानोगे इस शहर की बात
कभी सात नदियां बहां करती थी  साथ
सुफी संतों कबीरों का था जमवारा
बैशाखी पर किया करती थी मुटयारी संगम
ढोल के ताप पर डाला करते थे मुंडे भगड़ा
जश्न आजादी पर हुआ करती थी गलियों में रौनक
क्या जानोगे इस शहर की बात

Wednesday, January 02, 2013

और वह चली गई ......

और जिंदगी की जंग हार गई वो
न जाने वह कौन थी
न अपना थी न पराया थी
फिर भी दिल में बस्ती थी
न देखा था उसे न जानते थे उसको
हर घर, हर आंगन में थी उसकी जिक्र
खुले आसमान में जिंदगी जीने की चाहत लिए
वह चली गई पर एक स्याह छोड़ गई
अब नहीं बदलेगा तो कब बदलेगा
यह पुकार  है उसकी
उसकी कुर्बानी की कहानी
वो चली गई यादों में बस कर