Thursday, December 12, 2013

यह है पर्यटकों के लिए छत्तीसगढ़ के पांच प्रमुख आकर्षण केंद्र


छत्तीसगढ़ अपनी मनोरम छठा से पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा था। छत्तीसगढ़  में आदिवासी सभ्यता और संस्कृति आज भी कायम है जिनको करीब से जानने और देखने के लिए विदेशी भारत आते हैं। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, पुरातात्विक स्थलों, झरने, प्राचीन गुफाओं और वन्यजीव पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित है। मध्य प्रदेश के सोलह दक्षिण पूर्वी क्षेत्रों को विभाजित करके 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ। प्राचीन काल में इस क्षेत्र को दक्षिण कौशल  के नाम से जाना जाता था। छत्तीसगढ़ तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न  संस्कृतियों के विकास का केंद्र रहा है। आइए नजर डाालते हैं छत्तीसगढ़ के प्रमुख पांच आकर्षण केंद्रों पर जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।


चित्रकोट फॉल्स (चित्रकोट जलप्रपात)
खूबसूरत राज्य छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से 39 किमी दूर इंद्रावती नदी पर  चित्रकोट जलप्रपात बनता है। अपने घोड़े की नाल समान मुख के कारण इस जल प्रपात को भारत का निआग्रा भी कहा जाता है। दुनियाभर से इस चित्रकोट को देखने के लिए लाखों पर्यटक आते हैं। बरसात के मौसम में मिट्टी के कटाव के कारण भूरे रंग के छाया में आश्चर्यजनक सुंदर लगता है, जबकि गर्मियों में झरना क्रिस्टल रंग में स्पष्ट दिखाई देता है। चित्रकोट जलप्रपात का मनोरम दृश्य भव्य और शानदार है।


इंद्रावती नेशनल पार्क 
इंद्रावती नेशनल पार्क छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय और सबसे मुख्य वन्यजीव उद्यानों में से एक माना जाता है। 1983 में इस पार्क को टाइगर रिजर्व के रूप में घोषित किया है और जल्द ही भारत के सबसे मशहूर बाघ अभयारण्यों में से एक बन गया। अभयारण्य में तेंदुए, बंगाल टाइगर, स्लॉथ बीयर, जंगली कुत्ता, चार सींग वाले मृग, धारीदार हाइना और कई विलुप्त प्रजातियों के जानवर रहते हैं।

भोरमदेव मंदिर 
छत्तीसगढ़ के कवर्धा शहर में स्थित भोरमदेव मंदिर एक प्राचीन मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। भोरमदेव मंदिर को नाग राजवंश के राजा रामचंद्र लगभग 7 से 11 वीं शताब्दी तक की अवधि में बनाया गया था। भोरमदेव मंदिर में खजुराहो मंदिर की झलक दिखाई देती है, इसलिए इस मंदिर को छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है। भोरमदेव मंदिर पर नृत्य की आकर्षक भाव भंगिमाएं के साथ-साथ हाथी, घोड़े, भगवान गणेश एवं नटराज की मूर्तियां चंदेल शैली में उकेरी गई हैं। भोरमदेव महोत्सव में हजारों की संख्या में श्रद्धालु और पयर्टक इकट्ठा होते हैं। ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक महत्व को स्थानीय कलाकार की अपनी प्रतिभा के जरिए लोगों को साझा करते हैं।

कांकेर 
छत्तीसगढ़ के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित कांकेर जिले में कई रमणीय पर्यटक स्थल है। कांकेर पैलेस, झरना, जंगल, विभिन्न प्रकार के लकड़ी, गडिय़ा पर्वत और लकड़ी आदि के आकर्षणों के कारण कांकेर की ओर पर्यटक तेजी से उभर रहा है। सुंदर आदिवासी गांवों की संस्कृति और लकड़ी के नक्काशी वाले हस्तशिल्प व बांस की वस्तुओं की कलाकृतियां कांकेर की पहचान है। 12 वीं सदी में कांकेर पैलेस में शाही परिवार से रहते थे। महल के कुछ हिस्सों को एक होटल में तब्दील कर दिया गया है।

कोटमसर गुफा 
संभाग मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर कांगेरघाटी राष्ट्रीय उद्यान में कोटमसर गुफा स्थित है। विश्व की सबसे लंबी इस गुफा की लंबाई 4500 मीटर है। चूना पत्थर के घुलने से बनी ये गुफाएं चूनापत्थर के जमने से बनी संरचनाओं के कारण प्रसिद्ध है। पाषाणयुगीन सभ्यता के चिन्ह आज भी यहां मिलते हैं। कोटमसर की गुफा अपने प्रागैतिहासिक अवशेषों, अद्भुत प्राकृतिक संरचनाओं और  विस्मयकारी सुंदरता के लिए मशहूर है। कोटमसर गुफा पर्यटकों के लिए नवंबर में खोल दिया जाता है।

Wednesday, December 11, 2013

घाटियों और मठों की धरती लद्दाख के रंगीन त्योहार

 हिमालयी दर्रो के बीच स्थित लद्दाख की सुंदर झीलें, आसमान को छूते पहाड़ और आकर्षक मठ हर किसी को अपनी आकर्षित करता है। लद्दाख में त्योहारों के दौरान अनूठा तिब्बती संस्कृति, परंपरा और लद्दाखी लोगों की रहनसहन को बखूबी अनुभव किया जा सककता है। लद्दाख के विभिन्न क्षेत्रों में वर्ष भर में कई समारोह को मनाया जाता है। लद्दाख की प्राकृतिक सुंदरता और कई त्योहार पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है। पेश है लद्दाख के कुछ महत्वपूर्ण त्योहारों की सूची:-

हेमिस महोत्सव-
हेमिस लद्दाख में एक सबसे लोकप्रिय और सबसे बड़ा त्योहार है। हेमिस उत्सव का प्रमुख आकर्षक मुखौटा नृत्य है। जून माह में बौद्धविहार हेमिस का परिसर हेमिस महोत्सव से रंगीन हो उठता है। यह त्योहार गुरु पद्मसंभव को समर्पित है और उनके जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। स्थानीय लोगों और पर्यटकों दोनों एक साथ जश्न का आनंद लेते हैं। लंबे सींगों के साथ मुखौटों से सुशोभित नर्तक विशेष प्रकार की ढोल के साथ नृत्य करते हैं तो यह समा देखते ही बनता है। इस अवसर पर हस्तकला की कृतियों से भरा हुआ मेला दर्शकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र होता है।

दोसमोचे महोत्सव-
लेह में फरवरी के दूसरे सप्ताह में डोसमोचे महोत्सव मनाया जाता है। यह लद्दाख के नए समारोहों में से एक है। इस महोत्सव के दौरान हर साल विभिन्न मठों में मुखौटा नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। इस अलावा धार्मिक प्रतीकों को लकड़ी के खंभों पर पताका को सजाकर लेह के बाहर आयोजित किया जाता है। दोसमोचे त्योहार दो दिनों तक चलता है जिसमें बौद्ध भिक्षु नृत्य करते हैं, प्रार्थनाएं करते हैं और क्षेत्र से दुर्भाग्य और बुरी आत्माओं को दूर रखने के लिए अनुष्ठान करते हैं।

लोसर महोत्सव-
लोसर तिब्बती या लद्दाखी नव वर्ष के रूप में मनाया जाने वाला अन्य त्योहार है जो चंद्र कैलेंडर पर आधारित है। लद्दाख में लोसर का त्योहार दिसंबर और जनवरी के महीने में दो सप्ताह के लिए मनाया जाता है। लोसर त्योहार के दौरान आने वाले पर्यटकों पारंपरिक संगीत और नृत्य का आनंद देते हैं। त्योहार के दौरान होने वाली अनुभव से उनको मंत्रमुग्ध कर देती है। इस अवसर पर पुराने वर्ष की सभी बुराइयों और वैमनस्यों को समाप्त करने का प्रयत्न किया जाता है और नए साल में पूर्णतया नया जीवन आरंभ करने की कोशिश की जाती है। इस त्योहार की तिथि और स्थान हर साल बदलते रहते हैं।

माथो नागरंग-
मार्च के प्रथमार्ध में मनाए जाने वाले त्योहार माथो नागरंग के दौरान पवित्र अनुष्ठान और नृत्य प्रदर्शित किए जाते हैं। चार सौ साल पुराने थांगका या सिल्क से बनाई जाने वाली धार्मिक तिब्बती पेंटिंग और इसके साथ जुड़ा त्योहार माथो नागरंग पर्यटकों के बीच लोकप्रिय हैं। यह त्योहार माथो मठ में मनाया जाता है।

फियांग और थिक्से-
फियांग और थिक्से त्योहार लद्दाख में जुलाई या अगस्त में मनाया जाता है। इस त्योहार के दौरान विभिन्न मठों से भिक्षुओं भगवान और देवी के विभिन्न रूपों को दर्शाती है और अद्भुत मुखौटा नृत्य प्रदर्शन करने के लिए रंगीन जरी के वस्त्र और मुखौटे पहनते हैं।