monikaprince

Header Ads

छत पर सोने वाली गर्मियों की रातें कहां गईं....

गर्मी की रातों का नाम आते ही कभी खुले आसमान, ठंडी हवा और छत पर बिछी चारपाइयों की याद ताजा हो जाती थी। रात होते ही घरों की छतें लोगों से भर जाती थीं। कोई तारों को गिनता था, कोई चांद को देखता था और बच्चे देर रात तक हंसी-मजाक करते रहते थे।

आज समय बदल गया है। अब ज्यादातर लोग बंद कमरों और एसी-कूलर की दुनिया में सिमट गए हैं। ऊंची इमारतों और व्यस्त जिंदगी ने छतों की रौनक धीरे-धीरे कम कर दी। मोबाइल फोन ने भी उन रातों की बातचीत छीन ली, जहां पूरा परिवार एक साथ घंटों बैठा करता था।

पहले गर्मियों की रातें सिर्फ सोने के लिए नहीं होती थी, बल्कि रिश्तों को महसूस करने का समय होती थी। दादी-नानी की कहानियां, बिजली कटने पर होने वाली बातें और आसमान में टूटते तारों को देखने का अलग ही आनंद था। बच्चों के लिए छत एक छोटी-सी दुनिया जैसी होती थी।

अब शहरों में खुला आसमान भी कम दिखाई देता है। प्रदूषण, शोर और भागदौड़ ने जिंदगी की सादगी को कहीं पीछे छोड़ दिया है। नई पीढ़ी शायद उस खुशी को महसूस ही नहीं कर पा रही, जो बिना इंटरनेट और स्क्रीन के मिलती थी।

हालांकि समय बदलना स्वाभाविक है, लेकिन पुरानी यादें आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। गर्मी की वे रातें सिर्फ मौसम नहीं थी, बल्कि अपनापन, सुकून और परिवार के साथ बिताए खूबसूरत पलों की पहचान थी।

Post a Comment

0 Comments