Friday, January 25, 2013

...और करता था वह मेहनत



करता था वह (किसान) मेहनत हर दिन बेटा समझ कर ।  
आशा थी कि आगे चलकर उसकी जिंदगी का सहारा बनेगा।
सींचा करता था बेटी की तरह। आशा थी कि अपनी साया से दूसरे का भरण-पोषण करेगी।  
लेकिन क्या पता था कि अपनी मेहनत पर सींची फसल पर किसी और का अधिकार होगा।
न चाहते हुए भी उसे करनी पड़ी आत्महत्या। क्योंकि उसकी जमीन किसी और की हो गई।
पत्नी को आत्महत्या इसलिए करनी  पड़ी क्योंकि न तो उसके पास पति था और न ही कर्जे के पैसे।
बेटी ने संभाली पुरखों की बीड़ा, उसे खानी पड़ी पत्थर और गोली की मार।
आखिर बेटी को करनी पड़ी आत्महत्या क्योंकि उसकी अस्मत (इज्जत) लुट चुकी थी।
अत: बेटे ने भी कर ली आत्महत्या क्योंकि उसके पास नहीं बचा था कुछ बचाने को।

क्या जानोगे इस शहर की बात .....













क्या जानोगे इस शहर की बात
कभी हुआ करती थीं यहां हरियाली
खेत-खलियानों चौराहों पर हुआ करती थी अटहाली
कभी खिला करती थी हर आंगन में किलकारियां
क्या जानोगे इस शहर की बात
मिट्टी के कण-कण के खतिर मिट गए सुपुत्र
घर-आंगन सुना पड़ा पर मन हरियाली था
दे गए कुर्बानी आमन चैन के वास्ते
क्या जानोगे इस शहर की बात
किसानों ने बीजा वह बीज जो
दे गया हरित क्रांति का युग
लख-लख दुआएं देते हैं वे लोग
जिनकी तकदीरें लिखी इस शहर में
क्या जानोगे इस शहर की बात
कभी सात नदियां बहां करती थी  साथ
सुफी संतों कबीरों का था जमवारा
बैशाखी पर किया करती थी मुटयारी संगम
ढोल के ताप पर डाला करते थे मुंडे भगड़ा
जश्न आजादी पर हुआ करती थी गलियों में रौनक
क्या जानोगे इस शहर की बात

Wednesday, January 02, 2013

और वह चली गई ......

और जिंदगी की जंग हार गई वो
न जाने वह कौन थी
न अपना थी न पराया थी
फिर भी दिल में बस्ती थी
न देखा था उसे न जानते थे उसको
हर घर, हर आंगन में थी उसकी जिक्र
खुले आसमान में जिंदगी जीने की चाहत लिए
वह चली गई पर एक स्याह छोड़ गई
अब नहीं बदलेगा तो कब बदलेगा
यह पुकार  है उसकी
उसकी कुर्बानी की कहानी
वो चली गई यादों में बस कर