Monday, November 12, 2012

आखिर नारी विवश क्यों?

नारी हमारी समाज की आधारभूत स्तंभ है फिर भी आज समाज में हर जगह लोग नारी का ही शोषण करतें हैं। पुरुष समाज यह नहीं समझते की वह जो भी है यह उन्ही की देन है। अगर आज नारी नहीं होती तो पुरुष का अस्तित्व नहीं होता। नारी हर रूप में देखने को मिलती है।  कहीं वही नारी मां, भाभी, चाची, दादी किसी की पत्नी, बेटी बनकर रहती है। नारी के बिना तो भगवान भी अछूते है। सारे संसार की सृष्टि नारी के हाथों में है। पुरुष प्रधान देश जो सिर्फ नारी को अपने पैरों के नीचे रखने को आदि हो गए। वे समझा नहीं पाते हैं कि नारी के कारण ही रामायण या महाभारत उत्पन्न हुआ। रावण (जो की पुरुष था) सीता को हर कर ले गया, ये भी नारी द्वारा उत्पन्न रामायण की कहानी है। जनसमुदाय नारी और पुरुष दोनों से बना है फिर भी नारी को कमजोर और दुर्बल समझा जाता है। जब-जब धरती पर पुरुषों का अत्याचार बढऩे लगता है और स्वार्थ की प्रवृति से समाज पतन की गर्त में गिरने लगता है तो नारी की ममतामयी करूणा विभूषित होने लगती है। मानवता पर दानवता सवार हो जाती है तो त्राहिमान-त्राहिमान की करूण स्वर से दशाएं कांपने लगती है। ऐसी स्थिति में समाज एंव शासन को सत्ता पथ सत्तारूढ़ करने के लिए किसी न किसी ने किसी औरत को आगे आना पड़ता है, लेकिन दानवमयी समाज में वह जकड़ जाती है। नारी जो कि देश को चला सकती है फिर भी उसको पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता है क्योंकि वह विवश है। वे अपने परिवार, समाज द्वारा ऐसा करने पर मजबूर है। नारी के पैदा होते ही उसको नारी होना का यााद दिलाया जाता है कि बचपन में माता-पिता का अधीनता, बड़े होने पर पति की अधीनता और वृद्ध होने पर पुत्र की अधीनता होती है, लेकिन वे भूल जाते हैं कि उनको जो जन्म दिया वह एक औरत है जिसके अधीन वे समाज में खड़े होने के काबिल है। आज दहेज प्रथा से अलग होना नामुमकिन है। औरत तो विवश है उसे अपने परिवार की मान मर्यादा का ख्याल रखना पड़ता है। पुरुष तो औरतों से ज्यादा विवश है क्योंकि उसे औरतों के लिए उनके मुताबिक दामों में खरीदा जाता है। नारी तेरी रूप अनेक वाले कहावत चरितार्थ हर जगह मिलती है। कहीं यही औरत शादी के बाद चंद्रमुखी, उसके बाद सूर्यमुर्खी तथा अंत उनके आंतरिक प्रवृति से ज्वालामुखी बन जाती है। नारी के विवशता के कारण उनको पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ा है। वैदिक काल में स्त्रीयों को अपने अधिकार की स्वतंत्रा थी मगर आज सारा समाज शिक्षित है वहीं औरत को कर्म से विमुक्त होना आक्रमण का निर्माण प्राप्त करना उन्हें व्यर्थ की दलील लगती है। वे यह भूल जाते हैं कि प्रकृति की नियमों को कोई टाल नहीं सकता है जैसे सूर्य और चांद के बाद उदय और अस्त का नियम है तो फिर मनुष्य (पुरुष) भी क्यों स्वीकृत अधिकार की कामना करता है। संसार में सुख और दुख दोनों है। यदि सुख को कभी मूल नहीं जाता यदि दुख न होता। ठीक उसी तरह औरत के बिना पुरुष अधूरा है। तो नारी को विवश क्यों करता है। नारी वह है जो पुरुष नहीं हो सकता। नारी अगर 
 'फलों के लिए पानी है तो
 शूलों के लिए आग
 असूरों के लिए चंडी है तो
  बच्‍चों के लिए ममता की खान'
  नारी की यह स्‍थति है कि वह समाज और कर्तव्य की बलिदेवी पर चढ़ती आई है। यक क्रम कोई नया नहीं है यह तो युगों से होता आया है पुरुष सत्तात्मक समाज में नारी की जो दुर्गति होती है ज्वलत उदाहरण है सीता। जिसे पवित्रता साबित करने के लिए जीवित धरती में सता जाना पड़ा। नारी के लिए सामाजिक मर्यादाएं है। नारी तो नियमों, बंधनों और रीतियों की जेल में कैद रहती है। उनके लिए स्वतंत्रता तो एक स्वप्न है। यहीं तो हमारा समाज है जहां पुरुषों को हर तरह की छूट है, नारी  तो नियमों की दासी है। उसकी तमन्नाओं का हमेशा खून होता रहता है और नारी तो हमेशा समाज द्वारा हमेशा प्रताडि़त की गई है, लेकि न धीरे-धीरे उसकी विचार बदलते है। तब वह यह निष्कर्ष पर आती है कि  'चांदी का जला तो किसी का सिर फोड़ सकता है, लेकिन जब वह आभूषणों के नियमों, सांचों के अनुरूप वह चोट सहता है तो शोभा और श्रृंगार को बढ़ाने वाली चीज बन जाता है।' ठीक उसी तरह नारी भी सामाजिक बंधनों और नियमों की चोट खाकर जब अपनी पूर्णता सारी सृष्टि संपूर्ण संसार को अपनी तस्वीर के रूप में प्राप्त करती है तो पुरुष सोचने पर विवश हो जाते हैं कि यह वह नारी है जो कभी हमारी दासी थी। वह भूल जाते हैं कि हल्की सी खरोंच भी, यदि उस पर तत्काल दवाई न लगा दी जाए, तो बढ़कर एक बड़ा घाव बन जाता है। ठीक उसी तरह नारी भी सामाजिक बंधनों और नियमों की चोट खाकर जब अपनी पूर्णता सारी सृष्टि संपूर्ण संसार को अपनी तस्वीर के रूप में प्राप्त करती है तो पुरुष सोचने पर विवश हो जाते हैं कि यह वह नारी है जो कभी हमारी दासी थी। वह भूल जाते हैं कि हल्की सी खरोंच भी, यदि उस पर तत्काल दवाई न लगा दी जाय, तो बढ़कर एक बड़ा घाव बन जाता है और  वह घाव नासूर हो जाता, फिर लाख मरहम लगाओ, ठीक नहीं होता। पुरुष को यह स्वीकार कर लेनी चाहिए कि सम्पूर्ण सत्ता उसकी हाथों में नहीं होनी चाहिए, बल्कि जितनी हक उनकी है उतनी नारी की। क्योंकि ' नारी मानव जाति की जननी और दो पीढिय़ों को जोड़ी होनी एक कड़ी है' जो भारतीय संस्कृति और समाज में समान्य तुल्य होनी चाहिए। यह एक कड़वा सत्य है जिसे पुरुषों को स्वीकारना होगा। जिससे उनकी एंव सम्पूर्ण समाज की भलाई इसी में है।
                          नारी जागो एक बार
                          बुद्धि-बुद्धि में हो लीन
                          मन में मन, जी-जी में
                          एक अनुभव बहती रहे
                          उभय आत्माओं में  
                          कब से मैं रही पुकार
                          जागों फिर एक बार
                          नारी तो हो महान।। 

Wednesday, November 07, 2012

मन

मेरे सामने लक्ष्य है मेरा, अभी पूरा करना है
मत भटकाओं राहों से, बाधाओं से लडऩा है
तू राही भटकने वाला है, कोई क्या जाने तू मतवाला है
मन मेरा चंचल है, फिर क्यों प्राणों में उमंग भर जाता है
तब सोच-सोच कर  कहता है, तू चंचल तेरी मन चंचल
ये धरती तेरा बिस्तर है, तू दिन-रात का उजाला है
तेरी सोच राह दिखती है, मंजिल तक तुझे पहुंचाती है
तू मस्त घटा का चादर है, तेरी राह औरों से निराली है



Tuesday, November 06, 2012

जब जब होता है.....



जब जब होता है दंगा
आदमी हो जाता है नंगा
धर्म और मजहब का नाम
व्यर्थ में होता है बदनाम
आंखों से बरसने लगती है घृणा की धारा
पड़ोसी को बंदी कर लेती है उन्माद की धारा
पड़ोसी जन सड़कों पर सिसकता है
आदमी पर आदमी का विश्वास
चोरों की तरह तरह खिसकता है